Follow Me on Pinterest

आतिश-ऐ-इश्क में जलना था मुझे अकेला

आतिश-ऐ-इश्क में जलना था मुझे अकेला, तू गर साथ भी होता तो क्या होता
जब मरना ही था मुझे प्यासा, तो तू समुंदर भी होता तो क्या होता
दिल से निकले पाक-ऐ-अश्क को भी तुने जो बहाना माना
यकीं तुझे मुझ पर इतना तो फिर वो लहू भी होता तो क्या होता
मर तो यूँ भी रहा हूँ काफिर तेरे हाथो से में
तू महबूब न हो, दम-साज़ भी होता तो क्या होता
हम तो चले फ़क़त उन रास्तो पर जिनकी कोई मंजिले न थी
किस्मत में था अकेला चलना, तू गर हमसफ़र भी होता तो क्या होता
बहुत निकला इस दिल से प्यार, पर खुद से हारे है ‘शादाब’
ये दिल अगर दिल न हो पत्थर भी होता तो क्या होता

Get Free Email Updates Daily

Thanks for visiting Shayari Unplugged. Kindly Bookmark and Share

Technorati Digg This Stumble Stumble Facebook Delicious blinklist google myspace googleplus sharethis

Leave a comment