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वो महफिलें कहाँ गयी वो बज्में कहाँ गई

वो महफिलें कहाँ गयी वो बज्में कहाँ गई,
ता-उम्र साथ देने की रस्में कहाँ गई,
दो कदम साथ चल कर, कर लिया किनारा,
इक साथ जीने मरने की कसमें कहाँ गई,
आता है याद मुझ को उस का लगातार देखना,
जो झपकी कभी न थी वो पलकें कहाँ गई,
सूखे पत्तों की तरह बिखर जाती हैं उल्फतें,
जो पकती थी प्यार में वो फसलें कहाँ गई,
बुझ जाते हैं एक झोंके से झूठी चाहत के चिराग,
जो जलती थी आँधियों में, वो शमां कहाँ गई !!!

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